यह दिवाली का समय था। प्रिया का मायका छोटा सा शहर था, जहां हवा में चंदन की खुशबू और पटाखों की आवाजें घुली रहतीं। मां ने उसे बुलाया था—’बेटी, आ जा, घर सूना लग रहा है।’ अमित व्यस्त था, तो प्रिया अकेले ही चली आई। मायके की पुरानी हवेली में उतरते ही उसे लगा जैसे समय रुक गया हो। बचपन की गलियां, वो आंगन जहां वो दोस्तों के साथ खेलती थी, और पास ही का वो पुराना मंदिर जहां रोहन से पहली बार मिली थी।
पहले दिन सब सामान्य था। मां-बाप से बातें, चाची-मौसी की गपशप, और शाम को दीये जलाना। लेकिन दूसरे दिन, बाजार जाते वक्त प्रिया की नजर पड़ी एक परिचित चेहरे पर। रोहन! वो अब भी वैसा ही लग रहा था—लंबा कद, चौड़ी छाती, और आंखों में वो शरारत भरी चमक। कॉलेज के बाद वो शहर छोड़ गया था, लेकिन अब लौट आया था—अपने परिवार के कारोबार संभालने। प्रिया का दिल धक से रह गया। वो जल्दी से नजरें फेर लीं, लेकिन रोहन ने देख लिया।
‘प्रिया?’ उसकी आवाज पीछे से आई। प्रिया रुक गई। मुड़कर देखा तो रोहन मुस्कुरा रहा था। ‘कितने साल हो गए! तू तो… शादीशुदा लग रही है।’ उसके शब्दों में हल्की उदासी थी। प्रिया ने हिचकिचाते हुए कहा, ‘हां, अमित से शादी हो गई। तू कैसा है?’ बातें शुरू हुईं—कॉलेज की यादें, वो चोरी-छिपे मिलने, वो पार्क में चुम्बन। रोहन ने बताया कि वो कुंआरा ही है, कोई रिश्ता नहीं आया। प्रिया को अजीब सा लगा—खुशी और अपराधबोध का मिश्रण।
शाम को घर लौटते वक्त रोहन ने कहा, ‘कल मंदिर चलें? पुरानी यादें ताजा करें।’ प्रिया ने मना किया, लेकिन दिल कहीं और था। रात को सोते वक्त वो कल्पना करने लगी—रोहन के मजबूत हाथों का स्पर्श, उसके होंठों की गर्मी। अमित को फोन किया, लेकिन बातें फीकी लगीं। अगले दिन, प्रिया मंदिर चली गई। रोहन इंतजार कर रहा था। दोनों ने पूजा की, फिर पास के बगीचे में बैठे। हवा ठंडी थी, पत्तों की सरसराहट में उनकी बातें गूंज रही थीं।
‘मैं तुझे कभी भूल नहीं पाया, प्रिया,’ रोहन ने कहा, उसका हाथ धीरे से प्रिया के हाथ पर रखते हुए। प्रिया की सांसें तेज हो गईं। ‘रोहन, मैं शादीशुदा हूं। ये गलत है।’ लेकिन उसकी आंखें कुछ और कह रही थीं। रोहन ने उसे करीब खींचा। उनके होंठ मिले—धीरे से, फिर जुनूनी। प्रिया ने विरोध किया, लेकिन शरीर साथ नहीं दे रहा था। रोहन के हाथ उसकी कमर पर फिसले, फिर ऊपर की ओर। प्रिया की साड़ी की ब्लाउज में हाथ डालकर उसने उसके स्तनों को सहलाया। प्रिया सिहर उठी। ‘रोहन… यहां नहीं।’
वे बगीचे से निकले। रोहन ने कहा, ‘मेरे घर चल, कोई नहीं है।’ प्रिया का दिमाग चिल्ला रहा था—नहीं, लेकिन पैर चल पड़े। रोहन का घर मायके से थोड़ा दूर था, एक पुरानी कोठी। अंदर घुसते ही रोहन ने दरवाजा बंद किया। प्रिया को दीवार से सटा लिया। उसके होंठ प्रिया के गले पर लगे, चूमने लगे। प्रिया की सांसें उखड़ रही थीं। ‘रोहन, रुक… मां को पता चल जाएगा।’ लेकिन रोहन रुका नहीं। उसने प्रिया की साड़ी खींची, पेटीकोट नीचे सरका दिया। प्रिया की चूत नंगी हो गई, गीली और तैयार।
रोहन घुटनों पर बैठा। उसके हाथ प्रिया की जांघों पर फिसले, फिर चूत को छुआ। प्रिया चीखी, ‘आह… रोहन!’ रोहन ने जीभ निकाली और चूत पर चाटा। जीभ अंदर-बाहर हो रही थी, क्लिटोरिस को चूस रहा था। प्रिया के हाथ उसके बालों में उलझ गए। ‘हां… ऐसे ही… चाटते रहो।’ रोहन ने तेज किया। प्रिया का शरीर कांप रहा था, चूत से रस बह रहा था। वो चरम पर पहुंच गई—’रोहन! आ रही हूं!’ उसका शरीर झनझना उठा।
रोहन खड़ा हुआ। अपना पैंट उतारा। उसका लंड बाहर आया—मोटा, लंबा, सख्त। प्रिया ने देखा, पुरानी यादें ताजा हो गईं। वो घुटनों पर बैठ गई। लंड को हाथ में लिया, सहलाया। फिर मुंह में डाला। चूसने लगी—धीरे-धीरे, फिर तेज। रोहन कराहा, ‘प्रिया… तेरी जीभ कमाल है।’ प्रिया ने लंड को गले तक लिया, चाटा, चूसा। रोहन के हाथ उसके सिर पर थे, धक्के दे रहा था। ‘हां… ब्लोजॉब देती रह।’ प्रिया की लार लंड पर चिपचिपा रही थी। रोहन झड़ने वाला था, लेकिन रुका। ‘अभी नहीं।’
उसने प्रिया को उठाया, बेड पर ले गया। प्रिया को लिटाया, पैर फैलाए। लंड चूत पर रगड़ा। प्रिया बेचैन हो गई, ‘डालो रोहन… चोदो मुझे।’ रोहन ने धक्का दिया। लंड अंदर सरक गया—पूरी तरह। प्रिया चीखी, ‘आह! कितना मोटा है।’ रोहन ने पेलना शुरू किया—धीरे, फिर तेज। लंड चूत में अंदर-बाहर हो रहा था, चपचाप की आवाजें आ रही थीं। प्रिया के स्तन उछल रहे थे, रोहन ने उन्हें चूसे। निप्पल्स कड़े हो गए। ‘चूसो… काटो इन्हें।’ रोहन ने काटा, चूसा। प्रिया की चूत लंड को निचोड़ रही थी।
वे पोजीशन बदले। प्रिया ऊपर आ गई। लंड पर बैठी, उछलने लगी। उसके कूल्हे ऊपर-नीचे हो रहे थे। रोहन नीचे से धक्के मार रहा था। ‘प्रिया… तेरी चूत कितनी टाइट है।’ प्रिया कराह रही थी, ‘तेरा लंड… पुराना वैसा ही। चोदो जोर से।’ पसीना दोनों पर था, कमरा गर्म। प्रिया फिर चरम पर आई—’आह! झड़ रही हूं!’ उसकी चूत सिकुड़ गई, रस बहा। रोहन भी सहन न सका। लंड बाहर निकाला, प्रिया के पेट पर झाड़ दिया। गर्म वीर्य छूटा।
दोनों हांफते लेटे रहे। रोहन ने प्रिया को गले लगाया। ‘मैं तुझे कभी नहीं भूल सका। क्या हम फिर मिल सकते हैं?’ प्रिया की आंखों में आंसू थे। ‘रोहन, ये गलत था… लेकिन इतना सही भी कभी महसूस नहीं हुआ। अमित अच्छा है, लेकिन तू… तू मेरा पहला प्यार है।’ वे बातें करते रहे—भविष्य के सपने, पुरानी यादें। रोहन ने कहा, ‘जब भी आना मायके, मैं इंतजार करूंगा।’ प्रिया मुस्कुराई, लेकिन दिल भारी था।
अगले दिन प्रिया घर लौटी। मां ने पूछा, ‘कहां थी इतनी देर?’ प्रिया ने बहाना बनाया। लेकिन अंदर से वो बदल गई थी। अमित को फोन किया, प्यार से बात की, लेकिन रोहन की यादें मन में बस गईं। दिवाली की रौनक में प्रिया की जिंदगी में एक नया रंग आ गया था—पुराने आशिक का लंड, जो मायके की गोपनीयता में लिया था, वो अब उसके दिल की धड़कन बन गया।
लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई। कुछ महीनों बाद, प्रिया फिर मायके आई—इस बार बहाने से। रोहन का इंतजार था। इस बार वे और साहसी हुए। मायके के पास ही एक पुराना कुआं था, जहां रात को कोई नहीं आता। प्रिया चुपके से निकली। रोहन वहां था। बिना बात के वे गले मिले। रोहन ने प्रिया की सलवार उतारी, दीवार से सटाकर पीछे से लंड डाला। प्रिया दबी आवाज में कराही, ‘जोर से… चोदो।’ लंड चूत में घुसा, पेला। प्रिया का मुंह रोहन के हाथ से बंद था। तेज धक्कों से वो झड़ी। रोहन ने अंदर ही झाड़ दिया—गर्मी महसूस हुई।
फिर वे रोहन के घर गए। इस बार लंबी रात। रोहन ने प्रिया को नहलाया, फिर बेड पर। पहले चूत चाटी, फिर लंड चुसवाया। प्रिया ने गांड भी दी—पहली बार। रोहन ने तेल लगाया, धीरे से डाला। प्रिया दर्द से चीखी, लेकिन फिर मजा आया। ‘हां… गांड मारो।’ रोहन ने पेला, दोनों चरम पर आए। सुबह तक वे थक गए। प्रिया ने कहा, ‘ये हमारा राज रहेगा।’
समय बीता। प्रिया की जिंदगी में रोहन एक गुप्त अध्याय बन गया। अमित को शक नहीं हुआ। लेकिन हर मायके यात्रा में वो रोहन को लेती—उसके लंड को, उसके प्यार को। ये रोमांस था—गुप्त, जुनूनी, और अनंत। मायके की वो पुरानी हवेली अब प्रिया के लिए सिर्फ घर नहीं, बल्कि पुराने आशिक की बाहों का आश्रय थी।